जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। पिछले आठ दिनों में पेट्रोल के 1.82 रुपये और डीजल के 80 पैसे प्रति लीटर सस्ता होने पर ज्यादा खुशी मत मनाइये। यह खुशी चुनाव बाद दुख में बदल सकती है, क्योंकि इस बात के संकेत मिल रहे हैैं कि तेल कंपनियां पेट्रो उत्पादों की कीमतों में यह कटौती बाजार को देखकर नहीं, बल्कि किसी दबाव में कर रही हैं।

वैसे तो सरकारी तेल कंपनियों को घरेलू बाजार में पेट्रोल व डीजल की कीमत तय करने की आजादी मिली हुई है और वे इस आजादी के तहत ही रोजाना उक्त दोनों उत्पादों की खुदरा कीमत तय करते हैैं। पिछले तीन वर्षों में इस बात के कई उदाहरण हैैं, जब इन कंपनियों ने चुनावों से पहले अपनी इस ‘आजादी’ का इस्तेमाल नहीं किया है। इस बार भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति को देखें तो ऐसा लगता है कि तेल कंपनियां जान-बूझ कर कीमतें कम रख रही हैं। 6 मई, 2019 को दिल्ली मे पेट्रोल 73 रुपये प्रति लीटर था, जो 14 मई, 2019 को घटकर 71.18 रुपये हो गया है। जबकि डीजल इस दौरान 66.66 रुपये प्रति लीटर से घट कर 65.86 रुपये प्रति लीटर पर है।

यह कमी तब की गई है जब क्रूड की कीमतें कमोवेश स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन डॉलर के मुकाबले रुपये में मजबूती आई है। सोमवार को रुपया डॉलर के मुकाबले एक ही दिन में 59 पैसे कमजोर हो कर 70.51 रुपये पर बंद हुआ। यह रुपये का पिछले दो महीने का न्यूनतम स्तर है। बताते चलें कि घरेलू बाजार में पेट्रोल व डीजल की कीमत को तय करने में रुपये की कीमत की अहम भूमिका होती है। मोटे तौर पर अगर डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में 100 पैसे की की कमजोरी आती है तो पेट्रोल की कीमत में 40 पैसे के इजाफे की सूरत बनती है।

दूसरी तरफ इरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों को लेकर जो अनिश्चितता बन रही है, वह भी भारतीय ग्राहकों के लिए सुखद संकेत नहीं है। अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी रिश्तों को लेकर तनाव का असर भी क्रूड की कीमतों पर पड़ने की बात कही जा रही है।